प्यार अपने पे जो आता है तो क्या करते हैं

आईना देख के मुँह चूम लिया करते हैं

वस्ल का लुत्फ़ मुझे वस्ल से पहले ही मिला
जब कहा यार ने घबरा के ये क्या करते हैं

इस क़दर था मुझे उल्फ़त में भरोसा उन पर
की जफ़ा भी तो ये समझा कि वफ़ा करते हैं

है यही अर्ज़ ख़ुदा से कि फुलाँ बुत मिल जाए
वही अच्छे जो नमाज़ों में दुआ करते हैं

लब किसी के जो हिले कान उधर ध्यान उधर
दिल लगा कर वो मिरा ज़िक्र सुना करते हैं

सुब्ह को देख के आईने में बोसे का निशाँ
मुस्कुराते हुए होंटों में गिला करते हैं

कैसे कैसे मुझे बे-साख़्ता मिलते हैं ख़िताब
ग़ुस्सा आता है तो क्या क्या वो कहा करते हैं

क्या हुआ मुझ को रक़ीबों ने अगर दी ताज़ीम
तेरी महफ़िल में तो फ़ित्ने ही उठा करते हैं

कान बातों की तरफ़ आँख है कामों की तरफ़
हो के अंजान मिरा ज़िक्र सुना करते हैं

चीन पेशानी पे है मौज-ए-तबस्सुम लब में
ऐसे हँसमुख हैं कि ग़ुस्से में हँसा करते हैं

बस तो चलता नहीं कुछ कह के उन्हें क्यूँ हों ज़लील
हम तो अपना ही लहू आप पिया करते हैं

इस इशारे के फ़िदा ऐसे तजाहुल के निसार
मार कर आँख वो मुँह फेर लिया करते हैं

जलसे ही जलसे हैं जब से वो हुए ख़ुद-मुख़्तार
कोई इतना नहीं कहता कि ये क्या करते हैं

आशिक़ाना है अक़ीदा भी हमारा 'माइल'
ले के हम नाम-ए-बुताँ ज़िक्र-ए-ख़ुदा करते हैं

— Ahmad Husain Mail

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