उगा वीरानियों का इक शजर आहिस्ता आहिस्ता
शिकस्ता हो गए दीवार-ओ-दर आहिस्ता आहिस्ता
कहाँ जाता है ये सैल-ए-रवान-ए-उम्र-ए-गुम-गश्ता
बहे जाते हैं रोज़-ओ-शब किधर आहिस्ता आहिस्ता
मिरे दिल के ख़राबे को कभी आबाद कर ऐसे
मिरी जाँ के बयाबाँ से गुज़र आहिस्ता आहिस्ता
हुए हम दोनों ख़ाकिस्तर धुआँ उट्ठा न आँच आई
हुई क्यूँकर ज़माने को ख़बर आहिस्ता आहिस्ता
— Ahmad Azeem















