सूखे फूलों को भी गुल-दान में रक्खा हुआ है
शाहज़ादी ने हमें ध्यान में रक्खा हुआ है
हालत-ए-हिज्र पे तोहमत न लगा ऐ दुनिया
मैं ने उस शख़्स को इम्कान में रक्खा हुआ है
काफ़ी ताख़ीर से जागी है मोहब्बत तेरी
अब कोई और मिरी जान में रक्खा हुआ है
ग़ौर से सोचें तो हर शख़्स है सय्याद यहाँ
सब ने ही रूह को ज़िंदान में रक्खा हुआ है
— Ahmad Azeem















