ख़िज़ाँ में सूख भी सकती है फुलवारी हमारी
सुख़न-कारी में देखे कोई गुल-कारी हमारी
इक ऐसी सिंफ़ पे मब्नी है फ़नकारी हमारी
छुपाने से नहीं छुपती है दिलदारी हमारी
नहीं मिलते जो हम उन से भी मिलना चाहते हैं
बहुत रुस्वा कराती है मिलन-सारी हमारी
तुम्हारे आने के इम्काँ नज़र आते हैं हम को
ज़ियादा खिल रही है आज फुलवारी हमारी
हम अब मुश्किल-पसंदी की तरफ़ बढ़ने लगे हैं
उसे मुश्किल लगा करती थी हमवारी हमारी
चलो माना कि उस सूरत में भी हम हार जाते
मगर करते तो तुम थोड़ी तरफ़-दारी हमारी
— Ahmad Azeem















