इक तबस्सुम का था सौदा हम को
तू ने सस्ते में ख़रीदा हम को
मौज-दर-मौज है ग़म-हा-ए-फ़िराक़
पार करना है ये दरिया हम को
भूलते जाते हैं तुझ को जानाँ
ज़ख़्म दे फिर कोई ताज़ा हम को
बैठ जाते किसी दीवार के साथ
कब हुआ ये भी गवारा हम को
ऐ फ़लक थोड़ी सी रहमत हम पर
ऐ ज़मीं थोड़ा सा टुकड़ा हम को
— Ahmad Azeem















