छोटी छोटी बातों पर तुम ख़ूब तमाशा करती हो

तुम को देख के कौन कहेगा इक मुंसिफ़ की बेटी हो

ये भी इक कारन था तुम से अपने राज़ छुपाने का
चाहे जितना समझाओ तुम दुनिया से कह देती हो

वक़्त के रहते बैग में तुम ने अपने कपड़े रक्खे नईं
गाड़ी छूट रही है अब क्यूँ देख के मुझ को रोती हो

दुनिया क्या क्या सोच रही है हम दोनों के बारे में
मैं किस किस को बतलाऊँ तुम जल्दी से सो जाती हो

टोका-टाकी बस इक हद तक ठीक नतीजा देती है
बच्चा बिगड़ता है गर उस पे बे-मतलब की सख़्ती हो

— Ahmad Azeem

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