अब न सहरा है न दरिया बाक़ी
रह गई चश्म-ए-तमाशा बाक़ी
इन हवाओं ने न छोड़ा अब के
शाख़ पर एक भी पत्ता बाक़ी
छिन गया ज़ो'म-ए-गुल-अफ़्शानी-ए-लब
रह गया होंट पे नौहा बाक़ी
लौट जाने के लिए दश्त-ए-उमीद
अब रहा कोई न रस्ता बाक़ी
— Ahmad Azeem
रह गई चश्म-ए-तमाशा बाक़ी
इन हवाओं ने न छोड़ा अब के
शाख़ पर एक भी पत्ता बाक़ी
छिन गया ज़ो'म-ए-गुल-अफ़्शानी-ए-लब
रह गया होंट पे नौहा बाक़ी
लौट जाने के लिए दश्त-ए-उमीद
अब रहा कोई न रस्ता बाक़ी
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