सौ हाथ उठे कर्ब की ख़ुश्बू को चुराने
क्या ज़ख़्म लगाए हैं मिरे तन पे हवा ने
रस्ते में कोई पेड़ जो मिल जाए तो बैठूँ
वो बार उठाया है कि दिखने लगे शाने
आँखों में बसी थी तिरे चेहरे की तमाज़त
चलने न दिया राह में ज़ंजीर-ए-सदा ने
चेहरे थे कि मरक़द की तरह नौहा-ब-लब थे
क्या क्या न रुलाया मुझे मानूस फ़ज़ा ने
नग़्मों के तआ'क़ुब में न जाओ कि अभी तक
इंसाँ को मुयस्सर ही नहीं होंट हिलाने
क्यूँ इतने परेशान हो उनवाँ की तलब में
किरदार मुकम्मल हो तो बनते हैं फ़साने
आँखों के झरोकों से किसे ढूँड रहे हो
हर नक़्श मिटा डाला है सहरा की हवा ने
दुनिया में यही सोच के ज़िंदा हूँ मैं 'अफ़ज़ल'
एहसास तो बख़्शा है मुझे मेरे ख़ुदा ने















