नींद आई न खुला रात का बिस्तर मुझ से

गुफ़्तुगू करता रहा चाँद बराबर मुझ से

अपना साया उसे ख़ैरात में दे आया हूँ
धूप के डर से जो लिपटा रहा दिन भर मुझ से

कौन सी ऐसी कमी मेरे ख़द-ओ-ख़ाल में है
आइना ख़ुश नहीं होता कभी मिल कर मुझ से

क्या मुसीबत है कि हर दिन की मशक़्क़त के एवज़
बाँध जाता है कोई रात का पत्थर मुझ से

दश्त की सम्त निकल आया है मेरा दरिया
बस इसी पर हैं ख़फ़ा सारे समुंदर मुझ से

अपने हाथों को जो कश्कोल बनाया 'गौहर'
गिर पड़ा जाने कहाँ मेरा मुक़द्दर मुझ से

— Afzal Gauhar Rao

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