हम ने कुछ पँख जो दालान में रख छोड़े हैं

पंछी आ जाएँगे इस ध्यान में रख छोड़े हैं

सर-बुलंदी हो कि ऐ रहगुज़र-ए-दिल हम ने
सारे झगड़े ही तिरी शान में रख छोड़े हैं

ऐसा आशोब-ए-तवाज़ुन था कि पत्थर सारे
खेंच कर पल्ला-ए-मीज़ान में रख छोड़े हैं

सोचता हूँ कि वो ईमान ही ले आए कभी
रख़्ने कुछ ऐसे भी ईमान में रख छोड़े हैं

रख लिए रौज़न-ए-ज़िंदाँ पे परिंदे सारे
जो न वाँ रखने थे दीवान में रख छोड़े हैं

ऐसे कुछ दिन भी थे जो हम से गुज़ारे न गए
वापसी के किसी सामान में रख छोड़े हैं

आज का दिन है किसी बाद-ए-हिना चलने का दिन
आज के लम्हे इसी शान में रख छोड़े हैं

— Afzaal Naveed

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