ब-ज़ाहिर प्यार को दुनिया में जो नाकाम होता है

कोई रूसॊ कोई हिटलर, कोई ख़ैयाम होता है ।

ज़हर देते हैं उस को हम कि ले जाते हैं सूली पर,
यही इस दौर के मंसूर का अंजाम होता है।

जुनूने-शौक़ में बेशक लिपटने को लिपट जाएँ,
हवाओं में कहीं महबूब का पैग़ाम होता है ।

सियासी बज़्म मेम अक्सर 'ज़ुलेख़ा' के इशारों पर,
हक़ीक़त ये है 'युसूफ़' आज भी नीलाम होता है।

— Adam Gondvi

More by Adam Gondvi

Other ghazal from the same pen

See all from Adam Gondvi →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling