कोई दुख ऐसा खा गया मुझ को
शे'र कहना भी आ गया मुझ को
मैं बला की बुलंद इमारत था
एक कंकड़ ही ढा गया मुझ को
जब उसे मुझ से हो गई नफ़रत
ठीक तब ही वो भा गया मुझ को
पहली बाज़ी उसी ने खेली थी
तो वही शख़्स पा गया मुझ को
नज़्म कोई मुझे ही पढ़ बैठी
कोई गीत 'अम्र' गा गया मुझ को
— Yusha Abbas 'Amr'















