बच्चों की तरह वक़्त बिताने में लगे हैं
दीवार पे हम फूल बनाने में लगे हैं
धोने से भी जाती नहीं उस हाथ की ख़ुशबू
हम हाथ छुड़ा कर भी छुड़ाने में लगे हैं
लगता है वही दिन ही गुज़ारे हैं तेरे साथ
वो दिन जो तुझे अपना बनाने में लगे हैं
दीवार के उस पार नहीं देख रहे क्या
ये लोग जो दीवार गिराने में लगे हैं
अफ़सोस कि ये शहर जिन्हें पाल रहा है
दीमक की तरह शहर को खाने में लगे हैं
— Abbas Tabish















