बिछड़ कर क्या बताऊँ क्या रहा हूँ मैं

रही आधे में तुम, आधा रहा हूँ मैं

है तेरी मर्ज़ी मानों या न मानों तुम
तेरी ख़ातिर ग़ज़ल कहता रहा हूँ मैं

तेरा होकर, मैं तेरा हो नहीं पाया
सो ख़ुद को तुम बनाने जा रहा हूँ मैं

हुआ हूँ ख़ुश तेरे आमद से वरना तो
ख़ुशी और रंज़ में यकसा रहा हूँ मैं

इसी इक दिन के ख़ातिर ही तो मेरे दोस्त
कई रातों को दिन करता रहा हूँ मैं

— Aatish Alok

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