सभी को अपना समझता हूँ क्या हुआ है मुझे

बिछड़ के तुझ से अजब रोग लग गया है मुझे

जो मुड़ के देखा तो हो जाएगा बदन पत्थर
कहानियों में सुना था सो भोगना है मुझे

मैं तुझ को भूल न पाया यही ग़नीमत है
यहाँ तो इस का भी इम्कान लग रहा है मुझे

मैं सर्द जंग की आदत न डाल पाऊँगा
कोई महाज़ पे वापस बुला रहा है मुझे

सड़क पे चलते हुए आँखें बंद रखता हूँ
तिरे जमाल का ऐसा मज़ा पड़ा है मुझे

अभी तलक तो कोई वापसी की राह न थी
कल एक राह-गुज़र का पता लगा है मुझे

सड़क पे चलते हुए आँखें बंद रखता हूँ
तिरे जमाल का ऐसा मज़ा पड़ा है मुझे

अभी तलक तो कोई वापसी की राह न थी
कल एक राह-गुज़र का पता लगा है मुझे

— Aashufta Changezi

More by Aashufta Changezi

Other ghazal from the same pen

See all from Aashufta Changezi →

Hijrat Shayari

Shers of hijrat.

All Hijrat Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling