हमीं हैं रिफ़ाक़त में जाँ देते हैं

वगरना सभी बस गुमाँ देते हैं

कभी बात हम बस पते की करें
कभी उल्टे सीधे बयाँ देते हैं

कभी छोटे लोगों में बैठा नहीं
बड़े ख़्वाब इजाज़त कहाँ देते हैं

परे आसमाँ के है कोई जिसे
यूँ आवाज़ दोनों जहाँ देते हैं

कमी बाग़बानी में थी सो चलो
चमन को नया बाग़बाँ देते हैं

हिदायत मिले जाने कब ही तुम्हें
मुअज़्ज़िन तो अब भी अज़ाँ देते हैं

किराए पे रहते थे ख़ुद जो कभी
किराए पे अब वो मकाँ देते हैं

मुकरते नहीं हम किसी हाल पर
अगर हम किसी को ज़बाँ देते हैं

ख़ुदा जानता है कि साबिर हैं हम
सो हाँ रोज़-ओ-शब इम्तिहाँ देते हैं

तेरी चश्म-ए-गिरया के धोके सदा
बहुत सो को दर्द-ए-निहाँ देते हैं

भले मौसमों में भी कैसा सुकूँ
सभी कुछ वो कर राएगाँ देते हैं

करूँ ख़ूबियों का अगर ज़िक्र मैं
गिना वो मेरी ख़ामियाँ देते हैं

— Zaan Farzaan

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