नबी की दी हुई थी जो रिसालत भूल बैठे हो

नबी के चाहने वालों शुजा'अत भूल बैठे हो

मोहम्मद से मोहब्बत का तो दावा ख़ूब करते हो
मगर सिद्दीक़ अक़बर की सदाक़त भूल बैठे हो

तुम्हें उस्मान होना था उमर फ़ारूक़ होना था
सियासत करने वालों तुम ख़िलाफ़त भूल बैठे हो

किसी तपते हुए सहरा में थे प्यासे बहत्तर वो
अली ज़हरा के बच्चो की शहादत भूल बैठे हो

अरब वालो तुम्हें दी थी निगेहबानी जो का'बे की
नबी के ख़ुत्बे की तुम ही वसिय्यत भूल बैठे हो

सजा के सर पे तुम टोपी बने हो दीन के रहबर
मगर तुम दीन की अपने शरीअत भूल बैठे हो

बदर के तीन सौ तेरह का लश्कर याद है तुम को
या अब जंग-ए-जदल की तुम हज़ाक़त भूल बैठे हो

बटे हो तुम जो फ़िरक़ो में ज़रा क़ुरआन को थामो
रिवायत मानने वालों हक़ीक़त भूल बैठे हो

— ALI ZUHRI

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