थी कभी चाहत किसी की उस जुनूँ में अब नहीं हैं
क्यूँ करें फिर हम तमन्ना वो हमारे जब नहीं हैं
ख़ुश-नसीबी है ये टीके की कि माथे पे सजा है
ये मेरी है बद-नसीबी क्यूँ वहाँ ये लब नहीं हैं
नींद मुझ को आ भी जाएगी मगर फिर ये सितम है
वो वहाँ भी आ रही है ख़्वाब उस के कब नहीं हैं
चाहते हैं जो तुम्हें सब और तुम को ये गुमाँ है
ख़ैर देखो वो सभी के हैं तुम्हारे सब नहीं हैं
— Umashankar Lekhwar















