यादों से अपनी मेरे जज़बात-ए-दिल जगा के
सोए हैं चैन से वो नींदें मिरी उड़ा के
महफ़िल में मेरा आना हो जाएगा सुआरत
इक बार देख लें वो नज़रें अगर उठा के
लब खोलने की मुझ को मिल जाए गर इजाज़त
अपना बनाऊँ तुम को अपनी ग़ज़ल सुना के
दो फूल ज़ौ-फ़िशाँ हैं जो गेसुओं में उन के
मुझ को बुला रहे हैं ख़ुशबू लुटा लुटा के
वैसे तो तुम को तन्हा सब छोड़ कर गए हैं
इक बार देख लेना हम को भी आज़मा के
मैं सोचता हूँ उन की ता'रीफ़ में लिखूँ क्या
अंदाज़ हैं ग़ज़ब के तेवर भी हैं बला के
तलहा ये रंग यूँ ही आए नहीं ग़ज़ल में
हम साथ चल रहे हैं बहती हुई हवा के
— Talha Lakhnavi















