मुझे तेरी मुहब्बत भी ज़रूरी है

ज़रा सी तेरी नफ़रत भी ज़रूरी है

जहाँ अपनाए दुत्कारे मुझे लेकिन
मुझे ख़ुद से ही रग़बत भी ज़रूरी है

ज़माने के दिलों से वो न रुख़्सत हो
ख़ुदा की हो इबादत भी ज़रूरी है

नहीं हो ये ज़ियादा कम मुहब्बत में
मुहब्बत में क़नाअ'त भी ज़रूरी है

करे कोई जतन लाखों मगर फिर भी
मुक़द्दर की इनायत भी ज़रूरी है

— Sohit Singla

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Qismat Shayari

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