प्यार भी हो प्यार का अंजाम भी हो
साथ तेरे चाय उस पर शाम भी हो
क्या पता क्या है मगर कुछ बात तो है
क्या पता इस कुछ का कोई नाम भी हो
इतनी भी मसरूफ़ियत अच्छी नहीं है
वो बुलाए और मुझ को काम भी हो
ज़िन्दगी भी मौत को चुनती है आख़िर
हर कोई ये चाहता आराम भी हो
तब कहीं जा कर मुहब्बत रंग लाए
एक राधा हो तो दूजा श्याम भी हो
ज़िन्दगी तेरी सज़ा मंज़ूर है पर
शर्त ये है मुझ पे इक इल्ज़ाम भी हो
— SHABAN NAZIR















