गुज़िश्ता ज़िन्दगी के सारे ही हालात लिख बैठा

ख़्याल-ए-यार में आ कर मैं सब जज़्बात लिख बैठा

किसी के दर्द से वाक़िफ़ नहीं हूँ फिर भी जाने क्यूँ
मैं अपनी बात के बाइस सभी की बात लिख बैठा

मुहब्बत है यही यारों यही अंजाम है इस का
मैं अपनी जीत के क़िस्से सुनाकर मात लिख बैठा

ख़यालों में तिरे गेसू क़लम में है तिरा काजल
तसव्वुर में अमावस की अँधेरी रात लिख बैठा

मुझे मालूम ही क्या था ख़िज़ाँ पे बात करनी थी
तुम्हें देखा तो मैं भी दफ़ 'अतन बरसात लिख बैठा

— SHABAN NAZIR

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