मोहब्बत का महीना भी गया सूरत नहीं देखी

तेरे इस 'इश्क़ी सौदाई ने कुछ बरकत नहीं देखी

जो हज़रत पूछ बैठे हैं मोहब्बत क्यूँ नहीं करते
उन्हें पूछो उन्होंने क्या मेरी हालत नहीं देखी

मैं शाइ'र हूँ तो इनको लग रहा है जीत जाऊँगा
रक़ीबों ने अभी शायद मेरी ग़ुर्बत नहीं देखी

नहीं आएगा मिलने अब किसी का हो चुका है वो
मगर ईमान ने इंसान की फ़ितरत नहीं देखी

तराशे जाते हैं सब कोयले भी साथ हीरे के
जिसे शुब्हा है उस ने ताक़त-ए-सोहबत नहीं देखी

मेरी मसरूफ़ियत का हाल देखो अपने ही घर में
महीनों हो गए रहते अभी तक छत नहीं देखी

— Surendra Bhatia "Salil"

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