बा'द मुद्दत के अब मिली हो तुम
और थोड़ा सा खिल गई हो तुम
फिर से सत्रह का हो गया हूँ मैं
फिर से सत्रह की हो गई हो तुम
पाक नापाक की जिरह से परे
मुझ से मुझ सी ही फिर मिली हो तुम
सारी दुनिया ये क्या है धोखा है
एक बस मैं या इक खरी हो तुम
मिल के हम हम कहाँ रहे हैं अब
मैं सुख़न-वर हूँ शा'इरी हो तुम
— Surendra Bhatia "Salil"















