गिरा कोई यहाँ कोई वहाँ मस्ती में है पूरी

कि मख़्मूरी में कैसे खो गई बस्ती ये है पूरी

हमारी है बुरी आदत कि हम मय ही नहीं पीते
नशा सज्दे में है बे-लौस सी हस्ती ये है पूरी

कभी भी मैं नहीं करता नज़ारा उन हसीनों का
झुका बस रब के आगे मैं कि सर-मस्ती ये है पूरी

ख़ुदा आना पड़ेगा आज तुम को अर्ज़ पर देखो
नहीं मैं अब न मानूँगा ज़बरदस्ती ये है पूरी

— Rubball

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Dillagi Shayari

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