Saahir
Saahir
Ghazal

जो भी मिलती है हमें वो है सही अपनी जगह पर

मौत है अपनी जगह तो, ज़िंदगी अपनी जगह पर

पहले मैं भी सोचा करता था कि दोनों मुख़्तलिफ़ हैं
आशिक़ी अपनी जगह पर, ख़ुद-कुशी अपनी जगह पर

शा'इरी को धंधा मत समझो समझने वालों, मुझ को
नौकरी अपनी जगह है, शा'इरी अपनी जगह पर

उस की आँखें काम दो दो साथ में करती हैं, उस का
देखना अपनी जगह पर, दिल-लगी अपनी जगह पर

फ़र्क़ होता है क़ज़ा और ख़ुद-कुशी में, आँसू के साथ
ख़ुद-कुशी ने सब को बदनामी भी दी अपनी जगह पर

तुम मोहब्बत में मेरे पीछे न उतरो तो ही बेहतर
मैं करा लेता हूँ कुछ नुक़सान भी अपनी जगह पर

ध्यान रखना तुम कहाँ, क्या ठीक है बच्चे, जहाँ में
बोलना अपनी जगह पर, ख़ामुशी अपनी जगह पर

उलझे हैं हम लोग इक चक्कर में कितने जन्मों से यूँ
ज़िंदगी ये मौत से मिलती रही अपनी जगह पर

मैं मोहब्बत से यूँ भी दूरी बना कर रखता हूँ क्योंकि
छोड़ती है दर्द काफ़ी ये ख़ुशी अपनी जगह पर

सोचता हूँ मैं कभी क्या ठीक है ये जो है 'साहिर'
औरतें अपनी जगह पर, आदमी अपनी जगह पर

— Saahir

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