डोली उठा के ले गए महलों के बादशाह
सड़कों से देखते रहे सड़कों के बादशाह
उम्मीद की किरण में हर इक खेत जल गए
सलफ़ास खा के मर गए खेतों के बादशाह
मैं दूसरी ग़ज़ल की तरफ़ चल दिया तो दोस्त
पिछली बुलाती रह गई ग़ज़लों के बादशाह
आँखों की तख़्त-पोशी तो बीनाई ले गई
आँसू बनेंगे देखियो पलकों के बादशाह
— Rishabh Sharma















