फूल पे बैठी तितली अच्छी लगती है

हँसती खेलती लड़की अच्छी लगती है

तुम पर ऐसी कड़वी बातें नइँ जचतीं
चाय हमेशा मीठी अच्छी लगती है

ख़ामोशी से ग़ुस्सा बेहतर होता है
सर्दी में तो धूप भी अच्छी लगती है

सब की नज़रें उस पर ही क्यूँ होती हैं
मुझ को जो भी लड़की अच्छी लगती है

वरना मैं ऊँची आवाज़ नहीं सुनता
तू जो दे तो गाली अच्छी लगती है

जी करता है चूम लूँ उस के गालों को
इतनी, इतनी, इतनी, अच्छी लगती है

वो मुझ को अच्छी लगती है, बोला ना
ये मत पूछो कितनी अच्छी लगती है

— Rehan Mirza

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