मैं कितना बदनसीब हूँ
वो समझा बस रक़ीब हूँ
हुआ सभी से दूर पर
किसी के मैं क़रीब हूँ
सुना दिया जो अपना दर्द
उसे लगा सलीब हूँ
दवा है ये मिरी ग़ज़ल
मैं ख़ुद का ही तबीब हूँ
नहीं हूँ जौन सा मगर
मैं भी बहुत अजीब हूँ
— Prashant Rao chourase
वो समझा बस रक़ीब हूँ
हुआ सभी से दूर पर
किसी के मैं क़रीब हूँ
सुना दिया जो अपना दर्द
उसे लगा सलीब हूँ
दवा है ये मिरी ग़ज़ल
मैं ख़ुद का ही तबीब हूँ
नहीं हूँ जौन सा मगर
मैं भी बहुत अजीब हूँ
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