रईसों के गले में मोतियों का नूर-पाश है

नसीब सीपों के लिखा गया ये सर्वनाश है

समंदरों को भान है सुनामी कब कहाँ उठे
सुनामी उठ गई अगर विनाश ही विनाश है

भरोसे का मकान कच्ची ईंटों से बना हुआ
हवा से हिल गया बिख़र गया तो पाश-पाश है

जहाँ मसर्रतों की बारिशें कभी नहीं हुईं
वहाँ का आम आदमी भी हो चुका हताश है

यहाँ किसी भी बद-म'आश के लिए जगह नहीं
हमारा मीर ही लुटेरा और ख़ुश-म'आश है

खुशामदें यहाँ के हुक्मरानों को हैं चाहिए
यहाँ का नेक-दिल हबी भी साहिब-ए-फ़िराश है

न जाने कब से आ रहा चला रिवाज़-ए-कत्ल है
न जाने कब ये बन गया रिआया का म'आश है

यहाँ की धूप जानलेवा होती जा रही 'मिलन'
हमें किसी अनोखे से दरख़्त की तलाश है

— Milan Gautam

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