जान पहचान किसी से भी बनाएँ हम क्यूँ
चार लोगों का भला बोझ बढ़ाएंँ हम क्यूँ
बात लफ़्ज़ों में कभी तुम भी समझ लेना अब
बात सारी ही इशारों में बताएंँ हम क्यूँ
ये तमीज़ आप को थोड़ी बहुत आती होगी
आप को सामने से रोज़ बलाएँ हम क्यूँ
फ़र्क पड़ता नहीं फूलों को तिरे आने से
बाग़ में ऐसे गुलों को फिर उगाएंँ हम क्यूँ
क़ाबिल ए दार हमारे भी अलावा हैं बहुत
सिर्फ़ ख़ुद को ही गुनहगार गिनाएंँ हम क्यूँ
है ज़बान आप के मुँह में भी तो कुछ बोलो ना
हर दफ़ा आप की आवाज़ उठाएँ हम क्यूँ
और भी रंज हैं और दर्द ज़माने में भरे
बस मुहब्बत की ही ग़ज़लों को सुनाएँ हम क्यूँ
— Maher painter 'Musavvir'















