मुझ सा इक शख़्स हू-ब-हू मुझ

में
करता है मेरी जुस्तजू मुझ
में

ख़ुद से भी दूर मैं चला आया
अब नहीं कोई आरज़ू मुझ
में

रौशनी का निशाँ भी बाक़ी नहीं
फैली है रात कू-ब-कू मुझ
में

कोई भी तो नहीं मेरे अंदर
करता है कौन गुफ़्तगू मुझ
में

मुझ
में मेरा मैं भी नहीं बाक़ी
इस क़दर आ बसा है तू मुझ
में

पड़ी है ऐसी हिज्र की सर्दी
जम गया है मिरा लहू मुझ
में

तू अगर कोई आरज़ू ही है
तेरी क्यूँ कर हो आरज़ू मुझ
में

जिस ने मेरे यक़ीं को मारा है
बैठा है क्यूँ वो क़िबला-रू मुझ
में

— MIR SHAHRYAAR

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