लबों को सी के हर दम पीता हूँ ख़ून-ए-जिगर अपना

दर-ओ-दीवार से अब फोड़ता हूँ यारो सर अपना

किसे मुजरिम कहूँ किस को सज़ा दूँ ऐ दिल-ए-मुंसिफ़
ख़ुद अपने हाथों से मैं ने जलाया है ये घर अपना

अभी इन कहकशाओं से बहुत आगे गुज़रना है
यूँ ही चलता रहे बस शब के ऐ तारो सफ़र अपना

यूँ दर्द-ए-दिल सुनाने को फ़साने हैं बहुत लेकिन
उसे फ़ुर्सत कहाँ रखना है क़िस्सा मुख़्तसर अपना

किसी से क्या गिला रक्खें किसी से क्या शिकायत हो
जिसे आना हो आ जाएँ खुला रहता है दर अपना

कोई उम्मीद क्या रक्खें इलाज-ए-दर्द-ए-उल्फ़त की
कि ख़ुद भी इस मरज़ में मुब्तला है चारा-गर अपना

गुज़रते वक़्त की धुन ने भी धुँधलाए नहीं मंज़र
हरा होता रहा पल पल वो यादों का शजर अपना

मैं शीशा हूँ सुना है तू भी शीशों का मसीहा है
लो आया टूट के मैं अब दिखा दे तू हुनर अपना

— MIR SHAHRYAAR

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