उल्टा या सीधा दिख जाए
कोई तो रस्ता दिख जाए
उस का जब चेहरा दिख जाए
सहरा में दरिया दिख जाए
डर मिट जाए गर मलबे में
कोई भी ज़िंदा दिख जाए
बच्चों की भूख मिटाना है
चाहे फिर फंदा दिख जाए
कब से ढूढ़ रहा, अपनों में
कोई तो अपना दिख जाए
मन की आँखों से तो देखो
मौला जाने क्या दिख जाए
खिड़की वाली सीट पकड़ ली
शायद घर उस का दिख जाए
अब तो 'माहिर' ये आलम है
बस वो दोबारा दिख जाए
— Vijay Anand Mahir















