मैदान से हटने का इरादा नहीं करता

लश्कर तिरे होते हुए ऐसा नहीं करता

तुम ने ही उसे लाएक़-ए-सजदा नहीं माना
वरना वो इबादत का तक़ाज़ा नहीं करता

बिखरा के चला जाता है जज़्बात वो मेरे
जब लौट के आए तो इकट्ठा नहीं करता

अंदर जो जनाज़ा है दिखाना पड़ा इक दिन
लफ़्ज़ों से बताता तो भरोसा नहीं करता

वो फोन पे हर बात बता देता है मुझ को
पर सामने आए तो इशारा नहीं करता

चेहरे की तजल्ली मिरी इस आँख में ज़म है
बाला-ए-बनफ़्शी मुझे अंधा नहीं करता

— Jaffer Imam

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