दुल्हन बन कर वो तैयार हुई है
मेरी ताज़ी ताज़ी हार हुई है
अश़्कों अब बह जाओ तुम थोड़ा सा
रस्म-ओ-रुख़सत में दरकार हुई है
अपनों ने जब जब खींची ख़ंजर तो
हर तलवार फ़क़त बेकार हुई है
'जौन' चलो मस्जिद है हम को जाना
मक़्तल है हज़रत पर वार हुई है
दुल्हन के जोड़े में देखा उस को
दर्द मिरी बिल्कुल हमवार हुई है
वो अश्क लिए आँखों में यादों में
अब जा कर ज़ेहनी बीमार हुई है
क्या उम्दा बातें और अदाकारी थी
तू ख़ुद से अच्छी किरदार हुई है
आँखें उन पर से हटती तो कैसे
बरसों बा'द ये आँखें चार हुई है
रोती बोटी रोटी के ख़ातिर, अब
वो नीलाम भरे बाज़ार हुई है
— Happy Srivastava 'Ambar'















