देखते हैं उन लबों पर तीर है
फूल के हाथों में अब शमशीर है
कर रहे हैं इस तरह से दुख बयाँ
रात है इक पार्क है तस्वीर है
मर्द से बाहर निकल जब आओगे
औरतों में देखना इक मीर है
इक तरफ़ जो आ रहे हैं राम हैं
इक तरफ़ जो जल रहा कश्मीर है
जानवर अब रास्तों पे आ गए
उठ पड़ी अब धर्म की शमशीर है
— Happy Srivastava 'Ambar'















