Divu
Divu
Ghazal

तिरे रू-ब-रू मैं रहूँगा कभी तो

वही ख़्वाब मैला जि
यूँगा कभी तो

कहीं तेरी पायल कहीं चूड़ी होगी
इन्हीं आहटों से जगूँगा कभी तो

लिखी है ग़ज़ल सोच कर जो भी तुझ को
तुम्हें देख कर मैं पढूँगा कभी तो

उड़ी नींद मेरी मुसलसल कई दिन
हिसाब-ए-तबीअत करूँगा कभी तो

रहा क्यूँ मुयस्सर तिरी आह पर मैं
सबब सारे सच-सच कहूँगा कभी तो

कभी डाँट तेरी कभी प्यार हूँ मैं
अभी है ख़लिश पास हूँगा कभी तो

रखे सिर कभी बाज़ुओं पर तू थक कर
सुकूँ से ख़ुदा नींद लूँगा कभी तो

— Divu

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