ज़माना हमें बे-सहारा न समझे
ख़ुदा पर भरोसा गवारा न समझे
उसे कब मिला है जिसे भीड़ घेरे
उसे रब दिखा जो इजारा न समझे
किसी को मोहब्बत नहीं है वफ़ा से
मिरे हिज्र को तू गुज़ारा न समझे
जिसे मान कर ज़िंदगी जी रहे थे
वही मौत का था इशारा न समझे
बिछड़ना ज़रूरी नहीं था मगर तू
मोहब्बत नहीं है असारा न समझे
रहा है मुझे याद वो ज़िन्दगी भर
नफ़ा थी मोहब्बत ख़सारा न समझे
— Chetan















