कोई तो पंख साथ मेरा दे उड़ान में

फैलाने हैं दो रंग मुझे आसमान में

क़ातिल ने क़त्ल एक सर-ए-आम है किया
देखा नहीं है कुछ किसी ने है बयान में

फाँसी मिलेगी क़त्ल पे ऐसा उसूल क्यूँ
क्या मौत से बुरा नहीं है संविधान में

चालाकियाँ कभी भी दिखाना नहीं मुझे
ये एक तीर है अभी मेरी कमान में

मेरी हयात मुझ से अमूमन है पूछती
क्यूँ ज़िंदा है तू सबके लिए इस जहान में

अब हार ही गया तो मुझे मौत दे ही दो
दो-चार दिन ही काट सकूँगा थकान में

— Ayush Aavart

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