इक तिरी मुस्कान पर मैं आ लुटा दूँ आसमाँ
और जो तू हो ख़फ़ा तो मैं झुका दूँ आसमाँ
तेरे क़दमों में पड़ा था कल तलक मैं धूल सा
आज कह दे तू अगर तुझ को बना दूँ आसमाँ
चाँद जब पूछेगा मुझ से है कहाँ तेरी वफ़ा
तब उठा उस को नज़र मैं फिर दिखा दूँ आसमाँ
आज मुझ को दे रही हैं धोखा मेरी धड़कनें
पूछती हैं नाम ले कर क्या दिला दूँ आसमाँ
आज कल मिसरों में मेरे रब्त तक मिलता नहीं
अब ग़ज़ल क्या कहने को काग़ज़ बना दूँ आसमाँ
— Atul Kumar















