वो मेरी ज़िंदगी से कुछ ऐसे ग़ुजर गया
इक फूल शाख़ से गिरा गिर कर बिखर गया
मैं सोचता था हर्फ़-ए-दुआ से असर गया
रब की अता से दस्त-ए-तलब मेरा भर गया
दौर-ए-ख़िज़ाँ में साथ ये तन्हाइयाँ रहीं
आए समर तो पेड़ परिंदों से भर गया
कब तक रहोगे मुब्तला ग़फ़लत की नींद में
जागो कि अब तो सर से भी पानी गुज़र गया
ऐसी घुटन कि साँस भी लेना हुआ मुहाल
ये कौन इतना ज़हर हवाओं में भर गया
हाकिम ने देखो छीन लिए ना तुम्हारे हाथ
इनआम-ए-फ़न की चाह में दस्त-ए-हुनर गया
आख़िर तेरी अना की बग़ावत में ऐ 'अनीस'
दस्तार तो गई ही गई साथ सर गया
— Anis shah anis















