छेड़ो न मुझ को मैं हारा हुआ हूँ

कमसिन हसीनों का मारा हुआ हूँ

इक वक़्त दोनों जहाॅं चूमता था
जबरन फ़लक से उतारा हुआ हूँ

वो मेरी पूरी हयाती थी लेकिन
मैं पल जो रो कर गुज़ारा हुआ हूँ

ता'उम्र मैं एक ज़र्रा था लेकिन
अब मैं भी अंबर का तारा हुआ हूँ

कर ख़ून मेरा वो ख़ुश है तो फिर मैं
क्यूँ रोऊॅं गर उस का मारा हुआ हूँ

जाओ तुम इक इक गली पूछ आओ
कितनों से बचकर तुम्हारा हुआ हूँ

अब मैं किसी का सहारा हुआ हूँ
शाइ'र तो मैं फिर दोबारा हुआ हूँ

— Amit Rajvanshi 'Guru'

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