ये मुलाक़ात आख़िरी क्यूँँ हो
शहर-ए-जानाँ से वापसी क्यूँ हो
एक औरत को देखने के लिए
इतना बैचैन आदमी क्यूँ हो
जिस से ख़तरा नहीं मुहब्बत का
ऐसी लड़की से दोस्ती क्यूँ हो
मैं जो टोकूँ तो टोकती ही नहीं
मैं न टोकूँ तो टोकती क्यूँ हो
ख़ूब नोचा है ज़िंदगी ने मुझे
इतनी आसान ख़ुद-कुशी क्यूँ हो
हम हैं मालिक उदास चेहरों के
आइना देख कर ख़ुशी क्यूँ हो
तेरी चौखट पे जब अँधेरा है
मेरे कमरे में रौशनी क्यूँ हो
कर दिए दफ़्न पैरहन उस के
जो नहीं साँप केंचुली क्यूँ हो
जब सलीक़ा न हो बजाने का
हाथ मोहन के बाँसुरी क्यूँ हो
जब कोई काम ही नहीं मुझ से
मेरे बारे में सोचती क्यूँ हो
आ गए पास जब समुंदर के
फिर किनारे से वापसी क्यूँ हो















