मैं आँधियों की सियाह यलग़ार से बचा भी

तो अपनी मंज़िल न पा सकूँगा
कि रास्ते मैं ने अपने
बदल दिए हैं
तमाम बे-लौस हौसले भी कुचल दिए हैं
सफ़र मिरा अब शुरूअ' हुआ है
शुरूअ' रहेगा
हुजूम मिलने तो दो कहीं पर
क़दम न होंगे मिरे ज़मीं पर
बढ़ो बढ़ो की सदा-ए-माज़ी
बदन के सातों तबक़ में होगी
तो क्या करूँगा
कि मेरे अंदर ख़ुदा नहीं है
जो रोक लेगा
सफ़र मिरा अब शुरूअ' रहेगा

— Zafar Zaidi

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