मेहरबाँ साअ'त ने

अपनी गोद में
फूलों का गुलदस्ता सजाया
हवाओं को बुलाया
और कहा देखो
ज़मीं से आसमाँ तक
हद्द-ए-तख़य्युल-ओ-बयाँ तक
मकाँ से ला-मकाँ तक
तुम जहाँ तक जाओ
मेरी ख़ुशबुएँ हमराह ले जाओ
कि इमशब अर्श से ऐसा सितारा मैं ने पाया
कि घर मेरा मुनव्वर हो गया
आज ही के दिन हमारे दर पे सूरज ने सदा दी थी
यही वो दिन है जब
हम पर हमारे घर के दरवाज़े खुले थे

— Zafar Zaidi

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