हमारी दस्तरस में क्या है क्या नहीं

ज़मीं नहीं
ख़ला नहीं
कि आसमाँ नहीं
हमें तो सिर्फ़ सोचना ये चाहिए
कि मुट्ठियाँ खुली रहें
हथेलियों से उँगलियाँ जुड़ी रहें
ज़मीं से पाँव
पाँव से क़दम
क़दम से रास्तों का सिलसिला बना रहे
हमें तो सिर्फ़ देखना ये चाहिए
कि जिस को लोग रद्द करें
और अपनी दीद की ग़लीज़ चादरों से ढाँप कर शिकायतों से बाँध दें
हमारे जिस्म मावरा हों उस ग़िलाफ़ से
हमारी दस्तरस में क्या है क्या नहीं
बस यही तो शर्त है
हमारे जिस्म अन-गिनत रहें
मगर हमारे सर जुड़े रहें
रगों में प्यार का लहू रवाँ रहे बदन बदन जवाँ रहे
ज़मीं रहे ख़ला रहे न आसमाँ रहे
मगर हमें यही गुमाँ रहे
हमारी दस्तरस में क्या नहीं

— Zafar Zaidi

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