है कल की अभी बात कि थे हिन्द के सरताज

देते थे तुम्हें आ के सलातीन-ए-ज़मन बाज

क्या रंग ज़माने ने ये बदला है कि तुम को
दुनिया की हर इक क़ौम समझती है ज़लील आज

दामान-ए-निगह जिस की फ़ज़ा के लिए था तंग
वो बाग़ हुआ देखते ही देखते ताराज

जब तक रहे तुम दस्त-निगर अपने ख़ुदा के
होने न दिया उस ने तुम्हें ग़ैर का मुहताज

जो हो गए उस के वो हुआ उन का निगहबाँ
उस की है जिन्हें शर्म है उन की भी उसे लाज

मिट जाओ मगर हक़ को न मिटते हुए देखो
सीखो ये रविश गर तुम्हें लेना है स्वराज

— Zafar Ali Khan

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