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अकेलापन अकेला छोड़ता तो काम के रहते
भरी महफ़िल में हम जैसे बशर बस नाम के रहते
भरी महफ़िल में हम जैसे बशर बस नाम के रहते
मिरे दिल से मिटा दो उस परी-रू का निशाँ यारो
ये दरवाज़ा कभी खुलता नहीं उस नाम के रहते
यहाँ अच्छे बुरे का फ़र्क़ आलिम क्यूँ बताएगा
भला इस बे-मुरव्वत बे-ख़िरद आवाम के रहते
ये भी तो मोजज़े से कम नहीं यारो कि ज़िंदा हूँ
वो भी दिन रात हाथों में मुसलसल जाम के रहते
अगर बिजली चमकती है तो बादल भी बरसते हैं
मुझे मालूम है सब ठीक होगा राम के रहते
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उस से कहता हूँ इश्क़ मुहब्बत में रक्खा क्या है
पर अपने दिल को ये मैं कैसे समझाऊँ यारो
पर अपने दिल को ये मैं कैसे समझाऊँ यारो
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देख कर ग़म, मुस्कुराओ गुनगुनाओ, प्यार से तुम
दिल के' इन ज़ख़्मों को' सीने से लगाओ, प्यार से तुम
दिल के' इन ज़ख़्मों को' सीने से लगाओ, प्यार से तुम
प्यार क्या है, रोज़ मिन्नत, रोज़ ख़िदमत, रोज़ ज़िल्लत
जाँ मुझे आग़ोश में अपने समाओ, प्यार से तुम
है गुजारी जा रही रातें तिरी तस्वीर तक कर
यार इस से अब कभी बाहर भी' आओ, प्यार से तुम
सब यहाँ ख़ुद को ख़ुदा कहते, सभी अच्छे भले हैं
दोस्त मुझ को ख़ुश्क पत्तों से मिलाओ, प्यार से तुम
माँ कभी जो सो रहीं हों औ' तन्हा ख़ुद को' पाओ
छोड़ चिंता जल्द मौसी को बुलाओ, प्यार से तुम
हो नहीं पाती मुलाक़ातें मगर खलता नहीं ये
हो सके तो यार अब वापस बुलाओ, प्यार से तुम
मसअला ये है अधूरे रह गयें हैं ख़्वाब मेरे
जीने' ख़ातिर कुछ नए सपने दे' जाओ, प्यार से तुम
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सब से अच्छी दौलत यारों अय्यारी है
सोने चाँदी से भी अव्वल हुश्यारी है
सोने चाँदी से भी अव्वल हुश्यारी है
रोती है बच्ची पाने को सस्ती रोटी
क्या बोलूं ख़ुद्दारी है या लाचारी है
इश्क़ मुहब्बत है गर रस्ता जन्नत का तो
हिज्र बग़ावत को क्यूँ कहते गद्दारी है
खाना है मेवा बिन सेवा सरकारों को
देखो चारों सम्तें गिरवी हुश्यारी है
लेटा हूँ मैं ओढ़े चादर शैय्या पर अब
माशूका के घर शादी की तैय्यारी है
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