जब किया इज़हार तो हंँस कर मुझे कहने लगी
प्यार से दो बात करना प्यार हो जाता है क्या
हिज्र का फर्ज़ निभाया है मैं ने शिद्दत से
साल दो साल तलक मैं भी रहा हूँ तन्हा
ख़्वाब तुमने जो दिखाए थे मुझे उल्फ़त में
मैं जनाज़े के तले उनके दबा हूँ तन्हा
हिज्र में अब वो रात हुई है जिसमें मुझको ख़्वाबों में
रेल की पटरी, चाकू, रस्सी, बहती नदियाँ दिखती हैं
दुखी रहने की आदत यूंँ बना ली है कि अब कोई
ख़ुशी का ज़िक्र भी कर दे तो फिर तकलीफ़ होती है
मुहब्बत दूसरी बारी भी हो सकती है तुमसे पर
यकीं वापस से अब तुम पर दोबारा हो नहीं सकता
सीने से लगा लो मुझे तुम इक दफ़ा आकर
स्वेटर से मेरी जान ये सर्दी नहीं रुकती